देश में पाश्चात्य नव वर्ष मनाए जाने के कारण तेजी से भारतीय संस्कृति व परम्पराओं का ह्रास हो रहा है। इसे जीवित रखने के लिए हिन्दू नव वर्ष को अपनाना होगा।
उक्त बातें श्री नाथ संस्कृत महाविद्यालय के सभागार में नव संवत्सर वर्ष के अवसर पर आयोजित संगोष्ठी को बतौर मुख्य वक्ता संबोधित करते हुए सेवा निवृत्त प्राचार्य डॉक्टर सुधाकर तिवारी ने कही। उन्होंने कहा कि चैत्र प्रतिपदा हिन्दू नव वर्ष है। इसे भारतीय नव वर्ष भी कहा जाता है। इसे शक संवत्सर के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने कहा कि यूपी व विहार में पाश्चात्य सभ्यता तेजी से पांव पसार रही है। जिसकी वहा की संस्कृति धीरे धीरे समाप्त हो रही है। जबकि देश के दक्षिणी भारत गोवा, कोकण
व महाराष्ट्र में इस हिन्दू नव वर्ष को गुड़ी पड़वा के रुप में मनाया जाता है। और इससे वहां कि संस्कृतियां जीवित है। सबसे अच्छी पूजा मानसिक पूजा है। संस्कृति गांवों में बसती है।और सभ्यता शहरों में। संगोष्ठी की अध्यक्षता अवध समिति के उप प्रबंध जोखन प्रसाद वरनवाल ने की तथा संचालन सच्चिदानंद पांडेय ने किया।
इस दौरान प्रबंधक अग्निवेश मणि, अध्यक्ष जयप्रकाश नारायण पाण्डेय, मंत्री गंगेश्वर पांडेय, डॉक्टर राजेश चतुर्वेदी, रामानुज द्विवेदी, वशिष्ठ द्विवेदी, संजय पांडेय
सुभाष द्विवेदी, गिरिजेश सिंह, मोहन पांडेय, दिनेश भारद्वाज, रामगोविंद मणि सहित समस्त शिक्षक गण उपस्थित रहे।