असंभव की जीत: डॉ. अमित रंजन के साहसिक संघर्ष ने NMC की नीति बदली — अब INIs के डॉक्टरों को मिला न्याय और राहत

गोरखपुर एम्स के डॉक्टर अमित रंजन।

गोरखपुर। जब इरादे सच्चे हों और लक्ष्य न्याय हो, तो ईश्वर भी साथ देता है। डॉ. अमित रंजन ने यही कर दिखाया है एक ऐसा साहसिक कदम उठाया, जिससे राष्ट्रीय स्तर की नीति बदल गई।

हाल ही में नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने एक ऐतिहासिक निर्णय में “BCMET” (बेसिक कोर्स इन मेडिकल एजुकेशन टेक्नोलॉजी) को AIIMS, PGI, JIPMER जैसे सभी राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों (INIs) के डॉक्टरों के लिए राज्य मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी नियुक्ति हेतु अनिवार्य शर्त से छूट प्रदान की है। यह बदलाव जुलाई 2025 से प्रभावी हुआ है।

INIs डॉक्टर कौन होते हैं?

INIs का हिन्दी में अर्थ है — राष्ट्रीय महत्व के संस्थान (Institutes of National Importance)। ये वे प्रमुख चिकित्सा संस्थान हैं जिन्हें भारत सरकार द्वारा संसद के माध्यम से विशेष दर्जा प्राप्त है।

इनमें शामिल हैं:

AIIMS (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान)

PGIMER

JIPMER

तथा अन्य केंद्रीय चिकित्सा संस्थान।

INIs के डॉक्टर वे होते हैं जो इन अत्यंत प्रतिष्ठित और प्रतिस्पर्धी संस्थानों में चयनित होकर शिक्षण, प्रशिक्षण एवं चिकित्सा सेवा में लगे होते हैं।

BCMET सर्टिफिकेट की सीमाएं:

BCMET एक तीन दिवसीय ट्रेनिंग कोर्स है, जिसे राज्य चिकित्सा संस्थानों में फैकल्टी चयन के लिए अनिवार्य किया गया था। हालाँकि, केंद्रीय संस्थानों जैसे AIIMS, Safdarjung, RML इत्यादि में यह कोर्स आवश्यक नहीं है।

लेकिन जब कोई डॉक्टर केंद्र सरकार की प्रतिष्ठित संस्था छोड़कर राज्य संस्थान में शामिल होना चाहता, तो यह तीन दिन का कोर्स उसकी सालों की योग्यता पर भारी पड़ जाता, और उसे इंटरव्यू में बैठने तक की अनुमति नहीं मिलती थी।

डॉ. अमित रंजन की पहल: जब कोई साथ नहीं आया, तब भी वे डटे रहे

डॉ. अमित रंजन ने सबसे पहले डॉ. राम मनोहर लोहिया संस्थान, लखनऊ के प्रशासन, स्वास्थ्य मंत्रालय, और मीडिया से न्याय की गुहार लगाई, लेकिन कहीं से कोई सुनवाई नहीं हुई।

यहाँ तक कि उन्हें भी स्पष्ट रूप से यह कह दिया गया कि वे इंटरव्यू में भाग नहीं ले सकते क्योंकि उनके पास BCMET सर्टिफिकेट नहीं है।

तब डॉ. अमित रंजन ने ठान लिया कि यह नियम ही गलत है, और इसे बदलना ही होगा।

उन्होंने लखनऊ हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, जहाँ नेशनल मेडिकल कमीशन के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी माना कि यह नियम तर्कसंगत नहीं है।

सिर्फ तीन दिन के कोर्स के न होने से, उन डॉक्टरों की योग्यता पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता, जो पहले से AIIMS जैसे राष्ट्रीय संस्थानों में नियुक्त हैं, जहाँ चयन बेहद प्रतिस्पर्धी और पारदर्शी प्रक्रिया से होता है।

कानूनी लड़ाई: बिना फीस लड़े वकील और न्याय का साथ

इस केस में दिल्ली हाईकोर्ट के एडवोकेट कर्तिकेय यादव और लखनऊ हाईकोर्ट के एडवोकेट कर्तिकेय दुबे ने डॉ. अमित रंजन का केस बिना किसी फीस के लड़ा।

शुरुआत में जब डॉ. अमित ने अन्य डॉक्टरों से साथ चलने की अपील की, तो कोई आगे नहीं आया। लेकिन जब आप सच्चे होते हैं, तो ईश्वर खुद आपके अधिकार के लिए लड़ता है।

परिणाम: नीति में बदलाव और ऐतिहासिक विजय

इस लड़ाई का परिणाम यह हुआ कि डॉ. अमित रंजन को डॉ. राम मनोहर लोहिया संस्थान, लखनऊ की फैकल्टी चयन प्रक्रिया में शामिल होने का अधिकार मिला, और इसके साथ ही NMC ने राष्ट्रीय स्तर पर इस नियम को बदल दिया।

अब, सभी INIs (राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों) के डॉक्टर्स को राज्य मेडिकल कॉलेजों की नियुक्तियों में BCMET से छूट मिल गई है। नियुक्ति के बाद, वे यह कोर्स दो वर्षों के भीतर पूरा कर सकते हैं।

एक व्यक्ति की लड़ाई, पूरे देश के डॉक्टर्स की राहत

यह सिर्फ डॉ. अमित रंजन की व्यक्तिगत जीत नहीं है, यह सैकड़ों योग्य डॉक्टरों की आवाज़ है जो वर्षों से इस अन्यायपूर्ण नियम से जूझ रहे थे।

“यह केवल एक चयन नहीं — यह असंभव की जीत है। यह साहस, सच्चाई और नीतिगत बदलाव की ऐतिहासिक कहानी है।”

गोरखपुर से आशुतोष कुमार पांडे की रिपोर्ट।

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